सोमवार, 1 मार्च 2010

हंसी का राज

एक ब्लाक में रह रहे ,दो दम्पति संभ्रांत ।
एक बड़े खुशहाल से ,एक दुखी और क्लांत । ।
एक दुखी और क्लांत ,हमेशा लड़ते रहते ।
अपनी जीवन व्यथा ,सभी से रो रो कहते । ।
पर दूजे दम्पति का ,जाने क्या था चक्कर ?
घर से हंसने की आवाज़े आती अक्सर । ।

पहले दम्पति सोचते ,क्या है इसका राज ?
आती है हर रोज क्यों ,हंसने की आवाज़ ?
हंसने की आवाज़ ,प्रश्न एक दिन कीन्हा ।
दूजे दम्पति ने मुस्कराकर उत्तर दीन्हा । ।
"राजिस "हंसने से बढ़ता है खून हमारा ।
इसलिए हर दिन छोड़ा ,करते फव्वारा । ।

हम पति -पत्नी खेलते ,"बेलन -बेलन "यार ।
बारी -बारी फेंकते , गिनकर पूरे चार । ।
गिनकर पूरे चार ,वार यदि लग जाता है ।
हँसे मारने वाला ,बड़ी ख़ुशी पाता है । ।
किन्तु वार यदि बेलन का ,चुके लगने से ।
बचने वाला छोड़े ,फव्वारे हंसने के । ।

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010



सांस का पत्थर उखड़ेगा तो देखेंगे


जिस्म का पैकर टूटेगा तो देखेंगे ,


कितना दम था खेमे की बुनियादो में


जोर हवा का टूटेगा तो देखेंगे ,


कितना जोर था तूफानी बरसातों में


बरगद कोई उखड़ेगा तो देखेंगे ,


पहली बूँद के क्या -क्या रूप अनूप रहे


सीप से मोती निकलेगा तो देखेंगे ,


रात ने कितने अश्क बहाए सुबह तलक


शाखा से पानी टपकेगा तो देखेंगे ,


अपनी उम्र के रंग कहाँ तक मांद पड़े


बच्चा तितली पकड़ेगा तो देखेंगे ,


किसने किसको कितने पत्थर मारे है


पहरा जिस दम उठेगा तो देखेंगे ,


हर्फो -सदा ने मिलकर क्या गुलकारी की


खून कलम से टपकेगा तो देखेंगे ,


किसकी पेशानी ने कितने जख्म सहे


चाँद जमीं पर उतरेगा तो देखेंगे ,


जश्न मनाएं क्यूँ मांगे किरणों का 'नजीर'


अपना सूरज चमकेगा तो देखेंगे


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'नजीर' फतेहपुरी

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

'आज की सरकार'

बनी !आज ऐसी 'सरकार ',
चटनी में मिल गयी आचार
दूरदर्शन में देखे ,
सदन की कारवाई
देश हित की बात होती
होती बड़े बड़ाई
हम तुम ,हम तुम होते होते
बंद होती कारवाई
कारवाई की हालात ,
लगती बड़ी अजूबा
लूट खाये देश को ,
लगती यही मंसूबा
आज बनी है ऐसी सरकार ,
चटनी में मिली है अचार
पार्टी पार्टी का नाम नये ,
बनते एक से एक
देश हित में भरे पड़े ,
दल बदलू सांसद अनेक
स्वार्थ हित ,कार्य रहित ,
दल बदलू को अति आराम
इनके हर मंसूबे पर ,
लगा है पूर्ण विराम
टीका टिप्पणी ऐसे करते ,
जैसे हो अज्ञान
इर्ष्या द्वेष में सभी है दिखते,
करेंगे क्या देश काम
चोर !चोर !सब चोर ,
चोरी में है बदनाम
"चारा" का चोर ,
गुनाहों का चोर ,
सब चोरों में है नाम

गठबंधन सब महान

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रचनाकार ------इंदु सिंह



मंगलवार, 26 जनवरी 2010

आदर्श का स्तर





दूसरो को शिक्षा ,



दे रहे हम



स्वयं कितना अनुसरण



कर रहे हम ,



बात नैतिकता की



बात शिष्टता की ,



कहने -सुनने में



आसान भी ,



बेहतर भी



पर अहम है



खुद की जीवन के



आदर्श भरे स्तर की



वन्दे मातरम् -----जय हिंद


ज्योति सिंह

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

अंतर



दिन किसी का न सही


रात तो है मर्जी की अपनी ,


सुबह भाग दौड़ के साये से घिरी


रात्रि रही चैन की लिबास में लिपटी ,


प्रभात जिम्मेदारियों के बोझ तले


निशा का निमंत्रण मन को सुकून दे ।
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ज्योति सिंह

सोमवार, 4 जनवरी 2010

मकसद ....



रात अँधेरी थी


शाम मस्त सी ,


दोपहर विषाद लेती हुई ,


सुबह अरमान बिखेरी हुई ,


हर गमो से घिरी ,मगर


खुशियों को समेटी हुई ,


ज्ञान को फैलाती ,


हर क्षण को तौलती ,


उसके मूल्यों को पहचानती ,


आगे बढती हुई


जीवन के मकसद


समझाती रही


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रचनाकार ----ज्योति सिंह


सोमवार, 28 दिसंबर 2009

पछतावा

मानव क्यों उठता है ?

अच्छे कर्म से

क्यों गिरता है ?

कुछ गलतियों से

किसके लिए प्रयत्न करता ?

जिंदगी के लिए

परिश्रमी क्यों बनता ?

सफलता के लिए

इन सभी के बाद ,

क्या रखता है चाह ?

लक्ष्य की प्राप्ति

क्यों रोता है ?

जीवन का मूल्य

खो देने पर

कब करता पछतावा

मौका निकल जाने पर

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ज्योति सिंह