एक ब्लाक में रह रहे ,दो दम्पति संभ्रांत ।
एक बड़े खुशहाल से ,एक दुखी और क्लांत । ।
एक दुखी और क्लांत ,हमेशा लड़ते रहते ।
अपनी जीवन व्यथा ,सभी से रो रो कहते । ।
पर दूजे दम्पति का ,जाने क्या था चक्कर ?
घर से हंसने की आवाज़े आती अक्सर । ।
२
पहले दम्पति सोचते ,क्या है इसका राज ?
आती है हर रोज क्यों ,हंसने की आवाज़ ?
हंसने की आवाज़ ,प्रश्न एक दिन कीन्हा ।
दूजे दम्पति ने मुस्कराकर उत्तर दीन्हा । ।
"राजिस "हंसने से बढ़ता है खून हमारा ।
इसलिए हर दिन छोड़ा ,करते फव्वारा । ।
३
हम पति -पत्नी खेलते ,"बेलन -बेलन "यार ।
बारी -बारी फेंकते , गिनकर पूरे चार । ।
गिनकर पूरे चार ,वार यदि लग जाता है ।
हँसे मारने वाला ,बड़ी ख़ुशी पाता है । ।
किन्तु वार यदि बेलन का ,चुके लगने से ।
बचने वाला छोड़े ,फव्वारे हंसने के । ।
मित्रो, इस ब्लौग में मैं मेरे पसंदीदा रचनाकारों की रचनायें प्रस्तुत करूंगी, जो निश्चित रूप से आपको भी पसन्द आयेंगी.
सोमवार, 1 मार्च 2010
गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

सांस का पत्थर उखड़ेगा तो देखेंगे
जिस्म का पैकर टूटेगा तो देखेंगे ,
कितना दम था खेमे की बुनियादो में
जोर हवा का टूटेगा तो देखेंगे ,
कितना जोर था तूफानी बरसातों में
बरगद कोई उखड़ेगा तो देखेंगे ,
पहली बूँद के क्या -क्या रूप अनूप रहे
सीप से मोती निकलेगा तो देखेंगे ,
रात ने कितने अश्क बहाए सुबह तलक
शाखा से पानी टपकेगा तो देखेंगे ,
अपनी उम्र के रंग कहाँ तक मांद पड़े
बच्चा तितली पकड़ेगा तो देखेंगे ,
किसने किसको कितने पत्थर मारे है
पहरा जिस दम उठेगा तो देखेंगे ,
हर्फो -सदा ने मिलकर क्या गुलकारी की
खून कलम से टपकेगा तो देखेंगे ,
किसकी पेशानी ने कितने जख्म सहे
चाँद जमीं पर उतरेगा तो देखेंगे ,
जश्न मनाएं क्यूँ मांगे किरणों का 'नजीर'
अपना सूरज चमकेगा तो देखेंगे ।
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'नजीर' फतेहपुरी
गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010
'आज की सरकार'
बनी !आज ऐसी 'सरकार ',
चटनी में मिल गयी आचार ।
दूरदर्शन में देखे ,
सदन की कारवाई ।
देश हित की बात न होती
होती बड़े बड़ाई ।
हम तुम ,हम तुम होते होते
बंद होती कारवाई ।
कारवाई की हालात ,
लगती बड़ी अजूबा ।
लूट खाये देश को ,
लगती यही मंसूबा ।
आज बनी है ऐसी सरकार ,
चटनी में मिली है अचार ।
पार्टी पार्टी का नाम नये ,
बनते एक से एक ।
देश हित में भरे पड़े ,
दल बदलू सांसद अनेक ।
स्वार्थ हित ,कार्य रहित ,
दल बदलू को अति आराम ।
इनके हर मंसूबे पर ,
लगा है पूर्ण विराम ।
टीका टिप्पणी ऐसे करते ,
जैसे हो अज्ञान ।
इर्ष्या द्वेष में सभी है दिखते,
करेंगे क्या देश काम ।
चोर !चोर !सब चोर ,
चोरी में है बदनाम ।
"चारा" का चोर ,
गुनाहों का चोर ,
सब चोरों में है नाम
चटनी में मिल गयी आचार ।
दूरदर्शन में देखे ,
सदन की कारवाई ।
देश हित की बात न होती
होती बड़े बड़ाई ।
हम तुम ,हम तुम होते होते
बंद होती कारवाई ।
कारवाई की हालात ,
लगती बड़ी अजूबा ।
लूट खाये देश को ,
लगती यही मंसूबा ।
आज बनी है ऐसी सरकार ,
चटनी में मिली है अचार ।
पार्टी पार्टी का नाम नये ,
बनते एक से एक ।
देश हित में भरे पड़े ,
दल बदलू सांसद अनेक ।
स्वार्थ हित ,कार्य रहित ,
दल बदलू को अति आराम ।
इनके हर मंसूबे पर ,
लगा है पूर्ण विराम ।
टीका टिप्पणी ऐसे करते ,
जैसे हो अज्ञान ।
इर्ष्या द्वेष में सभी है दिखते,
करेंगे क्या देश काम ।
चोर !चोर !सब चोर ,
चोरी में है बदनाम ।
"चारा" का चोर ,
गुनाहों का चोर ,
सब चोरों में है नाम
गठबंधन सब महान ।
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रचनाकार ------इंदु सिंह
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
मंगलवार, 12 जनवरी 2010
अंतर
सोमवार, 4 जनवरी 2010
सोमवार, 28 दिसंबर 2009
पछतावा
मानव क्यों उठता है ?
अच्छे कर्म से ।
क्यों गिरता है ?
कुछ गलतियों से ।
किसके लिए प्रयत्न करता ?
जिंदगी के लिए ।
परिश्रमी क्यों बनता ?
सफलता के लिए ।
इन सभी के बाद ,
क्या रखता है चाह ?
लक्ष्य की प्राप्ति ।
क्यों रोता है ?
जीवन का मूल्य
खो देने पर ।
कब करता पछतावा
मौका निकल जाने पर ।
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ज्योति सिंह
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