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शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

'श्रद्धांजलि '


तुम आज नही हो वर्तमान ,
आयोजन है
श्रद्धांजलियों का ,
भाषण ,कुर्सिया ,मंच ,
मालायें शब्द ,पुस्तकें ,
लाउडस्पीकर आकाशवाणी ,
क्या तुम्हे पसंद नही ?
यह ढोल ,
यह खोल ,
तो बताओ
कैसे श्रद्धांजलि लोगे तुम ?
अपने नाम पर
चंदा करवाकर
नगर के चोंराहे पर
प्रतिमा -रूप में टंग जाना
पसंद क्यों नही करते तुम ?
मेरी मानो तो बन्धु ,
इसी में परम सुख है ,
कल्याण है ,
नेताओ के मुख से
हर साल (आज के दिन )
तुम्हे याद किया जाना
नगर के चौराहे पर
प्रतिमा बन खड़े हो जाना
थोड़े से रूपए खर्च होते है ।
वरना ,
तुम्हारे रास्ते पर अमल
तुम्हारी योजनाओ पर कार्य ,
तुम्हारे मार्गो पर यात्रा
बड़ा ही व्ययसाध्य है ,
और भारत ,
एक गरीब देश है ।
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रचनाकार -------कमला चांदवानी

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

भाई -बहन


तू चिंगारी बनकर उड़ री ,जाग -जाग मैं ज्वाल बनूँ ,
तू बन जा हहराती गंगा ,मैं झेलम बेहाल बनूँ ,
आज बसन्ती चोला तेरा ,मैं भी सज लूं लाल बनूँ ,
तू भगिनी बन क्रान्ति कराली ,मैं भाई विकराल बनूँ ,
यहाँ न कोई राधारानी ,वृन्दावन ,बंशीवाला ,
तू आँगन की ज्योति बहन री ,मैं घर का पहरे वाला ।
बहन प्रेम का पुतला हूँ मैं ,तू ममता की गोद बनी ,
मेरा जीवन क्रीडा -कौतुक तू प्रत्यक्ष प्रमोद भरी ,
मैं भाई फूलों में भूला ,मेरी बहन विनोद बनी ,
भाई की गति ,मति भगिनी की दोनों मंगल -मोद बनी
यह अपराध कलंक सुशीले ,सारे फूल जला देना ।
जननी की जंजीर बज रही ,चल तबियत बहला देना ।
भाई एक लहर बन आया ,बहन नदी की धारा है ,
संगम है ,गंगा उमड़ी है ,डूबा कूल -किनारा है ,
यह उन्माद ,बहन को अपना भाई एक सहारा है ,
यह अलमस्ती ,एक बहन ही भाई का ध्रुवतारा है ,
पागल घडी ,बहन -भाई है ,वह आजाद तराना है ।
मुसीबतों से ,बलिदानों से ,पत्थर को समझाना है ।
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कवि----गोपाल सिंह नेपाली
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बचपन से इस कविता को हम सभी भाई बहन अपनी माँ से सुनते आ रहे है और हमें आज भी ये उतनी ही प्रिय है ,इस पावन पर्व पर डालने से इसकी महत्ता और बढ़ जायेगी ,शायद आप सभी मित्रो को भी भाये ,रक्षाबंधन के शुभ अवसर पर बहुत बहुत बधाई ।

सोमवार, 24 मई 2010

चांद और कवि



रात यो कहने लगा मुझसे गगन का चाँद ,


आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है !


उलझने अपनी बनाकर आप ही फंसता ,


और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।


जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ ?


मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते ,


और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी


चांदनी में बैठ स्वपनों को सही करते ।


आदमी का स्वप्न?है वह बुलबुला जल का ,


आज उठता और कल फिर फूट जता है,


किन्तु, फिर भी धन्य, ठहरा आदमी ही तो?


बुलबुलों से खेलता, कविता बनता है,


में न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली ,


देख फिर से चाँद !मुझकों जनता है तू ?


स्वपन मेरे बुलबुले है? है यही पानी ?


आग को भी क्या नही पहचानता है तू ?


में न वह जो स्वप्न को केवल सही करते ,


आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ ,


और उस पर नीवं रखती हूँ नए घर की ,


इस तरह , दीवार फौलादी उठाती हूँ ।


मनो नही, मनु-पुत्र है यह सामने , जिसकी


कल्पना के जीभ में भी धार होती है ,


बाण ही होते विचारों के नहीं केवल ,


स्वप्न के भी हाँथ में तलवार होती है ।


स्वर के सम्राट को जाकर खबर कर दे ,


"रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे है वे ,


रोकिये , जैसे बने , इन स्वप्न वालों को,


स्वर्ग की ओर बढ़ते आ रहे है वे"।



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रचनाकार - रामधारी सिंह दिनकर