बुधवार, 4 नवंबर 2009

क्या पता .....

गोखरू की शक्ल में दिन -पर -दिन तबदील थी ,

क्या पता इस पाँव में कब से गडी यह कील थी

आज जो तुम देखते हो खुश्क रेतों को यहाँ ,

क्या पता है कि यहाँ कल खूबसूरत झील थी

इक धुंधलका ही था जो पर्दा बन गया है अब ,

वरना इसके बिना बहुत ये ज़िन्दगी अश्लील थी

क्या अंधेरो ने सबक सिखला दिया है फिर उसे ,

रात जो निकली तो उसके हाथ में कंदील थी


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रचनाकार ----विवेक सिंह

17 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

क्या अंधेरो ने सबक सिखला दिया है फिर उसे ,

रात जो निकली तो उसके हाथ में कंदील थी ।
बहुत गहरे भाव लिये है आप की यह कविता.
धन्यवाद

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Amit K Sagar ने कहा…

रचना इतनी उम्दा है कि हर शे'र को कई कई बार पढें का मन होता है.
--
महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा के खिलाफ [उल्टा तीर] आइये, इस कुरुती का समाधान निकालें!

KAVITA RAWAT ने कहा…

आज जो तुम देखते हो खुश्क रेतों को यहाँ ,
क्या पता है कि यहाँ कल खूबसूरत झील थी ।
Gahare bhav liye jiwan ke prati ingit karti aapki prastuti bahut achhi lagi.
Shubhkana.

Babli ने कहा…

वाह बहुत ही सुंदर कविता लिखा है आपने! बढ़िया लगा!

शरद कोकास ने कहा…

गोखरू का यहाँ यह प्रयोग अच्छा लगा ।

BrijmohanShrivastava ने कहा…

बहुत गम्भीरता लिये हुए शेर कि आज जहां सूखी रेत है वहां कल सुन्दर झील रही होगी ,आध्यात्मिक और सांसारिक दौनो द्रष्टि से ।मानव देह की भी यही स्थिति ।व्यक्ति जिसे हम आज ठूंठ समझ रहे है हो सकता है वह कल एक सुन्दर फ़लदार ब्रक्ष रहा हो ,और यह होता भी है यह संसार का नियम है ।यह भी सम्भव है कि रेत ही वह धुंधलका हो जो परदा बन गया हो ।अन्धेरा अगर सबक सिखलायेगा तो कन्दील लेकर निकलना ही पडेगा । अंधेरों की जगह अंधेरे भी हो सकता था -अन्धेरों शायद बहुबचन करके लिखा गया होगा ।ठीक है ।रचनाकार श्री विवेक बेहतर समझते होंगे ।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

मोहतरमा ज्योति सिंह जी,
सुन्दर रचनाओं के संग्रह की प्रस्तुति के लिये बधाई
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

Nirmla Kapila ने कहा…

आज जो तुम देखते हो खुश्क रेतों को यहाँ ,

क्या पता है कि यहाँ कल खूबसूरत झील थी
बहुत सुन्दर रचना है बधाई। रचना पूरी ही अच्छी मगर ये उपर वली पंक्तियाँ लाजवाब हैं

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह ने कहा…

sundar gazal apko badhai,sunder rachna prastuti ke liye aabhar bandhu,
aapka hi
dr.bhoopendra rewa mp

शोभना चौरे ने कहा…

jyotiji
bahut hi sundar rachna .gokhru shabd ka pryog achha lga .aaj ki pidhi to is shabd se anjan hai
आज जो तुम देखते हो खुश्क रेतों को यहाँ ,
क्या पता है कि यहाँ कल खूबसूरत झील थी ।
ye pnktiya man me asha ka sanchar kar gai aur prkrti ke rahasy ko smjha gai

करण समस्तीपुरी ने कहा…

क्या अंधेरो ने सबक सिखला दिया है फिर उसे ,

रात जो निकली तो उसके हाथ में कंदील थी ।

सच में, रंग लाती है हिना पत्थर पर घिस जाने के बाद !

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना शुक्रिया

ज्योति सिंह ने कहा…

aabhari hoon dil se aap sabhi ki ,jo yahan aakar is rachna ko itna pasand .

Rohit Jain ने कहा…

bahut achchhi rachna hai.........Shukriya

panchayatnama ने कहा…

गोखरू - का क्या मतलब होता है.. क्षमा कीजिये मेरे अज्ञान को.. वैसे रचना काफी बढियां है

psingh ने कहा…

बेहतरीन रचना
बहुत -२ हार्दिक शुभ कामनाएं