गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

चार मुक्तक


जिंदगी को मृत्यु का पीना जहर है ,
वक़्त की हर सांस में सोयी कहर है ,
चाँद पर दुनिया भले कोई बसाले ,
अंत में इंसान का मरघट शहर है
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आन पर दे जान ,वह बलिदान है ,
जो रहे बेदाग़ ,वह ईमान है
जो पराये दर्द को अपना सके ,
है नही इंसान वह भगवान है
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संयमित चाह का विस्तार नही होता है ,
दर्द से दर्द का श्रृंगार नही होता है
टूट जाये जो समय की आँधियों के साथ ही ,
बस हविश है देह की ,वह प्यार नही होता है
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लाश जलती देख कर हम सोच लिया करते है ,
जो यहाँ पैदा हुए , दो रोज जिया करते है
जानते है ,हर घड़ी है काल की अपनी घड़ी ,
लौट कर घर ,फिर वही हम पाप किया करते है

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

मुक्तक


इक पल की हार पर ,दुख कर ,
मुस्कुरा के इसे भी ,स्वीकार कर ,
चलना सिखला देती है ,इंसान को ,
राह में लगी हुई ,हर इक ठोकर
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उगते सूरज को , कौन रोक पाया
किरण को अँधेरा कब ढांप पाया ,
जुलम - -सितम से ,कब इंसान हारा ,
आशा को भला कौन मिटा पाया
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सतत प्रयत्न ही ,दुनिया में सफल होते है ,
वे मूर्ख होते है ,जो पछताते रहते है ,
भुला कर अतीत ,भविष्य में झांको ,
पाते है मंजिल वही ,जो चलते रहते है
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दुख को ही ना अपनी नियति मान
असफलताओ को ना ,अपना भाग्य जान ,
उठ संघर्ष कर ,कर्म कर
हर मुसीबत से लड़ना ,अपना फर्ज जान
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अरुणा शर्मा


शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

'श्रद्धांजलि '


तुम आज नही हो वर्तमान ,
आयोजन है
श्रद्धांजलियों का ,
भाषण ,कुर्सिया ,मंच ,
मालायें शब्द ,पुस्तकें ,
लाउडस्पीकर आकाशवाणी ,
क्या तुम्हे पसंद नही ?
यह ढोल ,
यह खोल ,
तो बताओ
कैसे श्रद्धांजलि लोगे तुम ?
अपने नाम पर
चंदा करवाकर
नगर के चोंराहे पर
प्रतिमा -रूप में टंग जाना
पसंद क्यों नही करते तुम ?
मेरी मानो तो बन्धु ,
इसी में परम सुख है ,
कल्याण है ,
नेताओ के मुख से
हर साल (आज के दिन )
तुम्हे याद किया जाना
नगर के चौराहे पर
प्रतिमा बन खड़े हो जाना
थोड़े से रूपए खर्च होते है
वरना ,
तुम्हारे रास्ते पर अमल
तुम्हारी योजनाओ पर कार्य ,
तुम्हारे मार्गो पर यात्रा
बड़ा ही व्ययसाध्य है ,
और भारत ,
एक गरीब देश है
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रचनाकार -------कमला चांदवानी

गुरुवार, 11 नवंबर 2010


हुस्न वालों का अहतराम करो

कुछ तो दुनिया में नेक काम करो ,

शेख़ आए है बावजू होकर

अब तो पीने का इंतजाम करो

अभी बरसेंगे हर तरफ जलवे

तुम निगाहों का अहतमाम करो ,

लोग डरने लगे गुनाहों से

बारिश -- रहमत - -तमाम करो
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अर्थ ----
अहतराम -इज्ज़त ,बावज़ू --वजू करना ,
बारिश -- रहमत - -तमाम -खुदा की कृपा की बारिश
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रचनाकार ----कँवर मोहिंदर सिंह बेदी 'सहर '
बेदी जी की इस रचना को आप सभी ने जगजीत सिंह जी की आवाज़ में सुना ही होगा ,यह मुझे बेहद पसंद है शायद आपको भी आए .इसे सुनते - ही लिख रही हूँ अभी .

सोमवार, 27 सितंबर 2010

नीरज जी कुछ दोहे


आत्मा के सौन्दर्य का ,शब्द रूप है काव्य
मानव होना भाग्य है ,कवि होना सौभाग्य

जब से पनपा देश में ,अयोग्यता का वंश
कौए तो मोती चुगे ,आंसू पीये हंस

सिसक - सिसक रोया बहुत सारा घर - परिवार
जिस दिन उठवायी गई आँगन में दीवार

हो जाये जब शान्ति के सब प्रयत्न बेकार
तब फिर केवल युद्ध ही अंतिम उपचार

घर -घर में आंधी खडी दर -दर पर तूफ़ान
कैसे इस माहौल में ,जिए कहो इंसान


कुर्सी की महिमा अमित ,हमसे कही जाये
कभी बिठाये तख्त पर ,कभी जेल पहुंचाए


पीछे तो निंदा करे ,सम्मुख परसे प्यार
खतरनाक है शत्रु से ज्यादा ऐसे यार

विज्ञापन ने है रचा ऐसा मायाजाल
हम साड़ी के दाम में , करते क्रय रूमाल

टी .वी ने हम पर किया यूं छुप -छुप कर वार
संस्कृति सब घायल हुई बिना तीर -तलवार


बनना है तुमको अगर 'नीरज ' यहाँ अमीर
सोचो मत किस चीज को कहते यहाँ जमीर

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गोपालदास नीरज



सोमवार, 13 सितंबर 2010

जीवन नही मरा करता है


छुप छुप अश्रु बहाने वालों !
मोती व्यर्थ लुटाने वालों !
कुछ सपनो के मर जाने से जीवन नही मरा करता है
सपना क्या है नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ,ज्यो
जागे कच्ची नीँद जवानी ,
गीली उमर बनाने वालों !
डूबे बिना नहाने वालों !
कुछ पानी के बह जाने से सावन नही मरा करता है
कुछ भी मिटता नही यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चाँदनी
पहने सुबह धूप की धोती ,
चाल बदल कर जाने वालों !
वस्त्र बदल कर आने वालों !
चंद खिलौने के खोने से बचपन नही मरा करता है
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गोपालदास नीरज