शनिवार, 19 दिसंबर 2009

भरोसा ..

सच हो , लोगो की बात

शंकित हो ,मेरे विचार ,

कमजोर करो, मेरे विश्वास

संकीर्ण करो ,अपने ख्याल ,

कुछ तो रक्खो ,रिश्तों की लाज

जिससे टूटे ,मन की आस

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

मैं आज शहरयार की ग़ज़ल लिख रही हूँ ,शायद आप सभी उन्हें पढ़े होंगे -----


तुम्हारे शहर में कुछ भी हुआ नही है क्या

कि तुमने चीखों को सचमुच सुना नही है क्या


तमाम खल्क -ए-खुदा इस जगह रुकी क्यो है

यहाँ से आगे कोई रास्ता नही है क्या


लहू -लुहान सभी कर रहे है सूरज को

किसी को खौफ यहाँ रात का नही है क्या


मैं एक ज़माने से हैरान हूँ कि हाकिम - -शहर

जो हो रहा है उसे देखता नही है क्या


उजाड़ते है जो नादाँ इसे उजड़ने दो

कि उजड़ा शहर दोबारा बसा नही है क्या

बुधवार, 4 नवंबर 2009

क्या पता .....

गोखरू की शक्ल में दिन -पर -दिन तबदील थी ,

क्या पता इस पाँव में कब से गडी यह कील थी

आज जो तुम देखते हो खुश्क रेतों को यहाँ ,

क्या पता है कि यहाँ कल खूबसूरत झील थी

इक धुंधलका ही था जो पर्दा बन गया है अब ,

वरना इसके बिना बहुत ये ज़िन्दगी अश्लील थी

क्या अंधेरो ने सबक सिखला दिया है फिर उसे ,

रात जो निकली तो उसके हाथ में कंदील थी


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रचनाकार ----विवेक सिंह

शनिवार, 17 अक्टूबर 2009

यथार्थ

ज़िन्दगी की हार पर इस कदर मायूस हो

मौत की ही जीत पर तू खुशियाँ मना ले

ईंटे-पत्थरो के महल में सूकून नही होता

एक -दूसरे के दिल में ही तू जगह बना ले

बुझ गए है सारे दिए साथ के तेरे

पहचान अगर बनानी है तो ख़ुद को जला ले

बुझने से बचा ना पायेगा दिवाली के दिए को

हकीकत के ही अंधेरे से तू घर को सजा ले

दिली चाहत है मिटाने की ,जो मज़हब की हदों को

रमजान मना लूँ मैं ,दशहरा तू मना ले

दिवाली है नही पूजने को लक्ष्मी की मूर्ति

गृह-लक्ष्मी को तू एक दिन तो लक्ष्मी बना ले

दो वक्त दीपक जलाया और लक्ष्मी मिल गई

माँ -बाप के अरमान ऐसे ,काश पूरे हो जाते सही

ज़िन्दगी भर पूजा है तन -मन -धन से जिसने तुझे

अब देर कर उठ ,पूजा की भभूति छोड़कर

जा माँ -बाप के चरणों की थोड़ी धूल लगा ले


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रचनाकार -----विवेक सिंह

शुभ -दीपावली

यथार्थ

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

आदम को खुदा मत कहो

आदम खुदा नही ,

लेकिन खुदा की नूर से

आदम जुदा नही

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अकबर इलाहाबादी

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दर्द से कुछ इस तरह नाता रहा

दर्द का अहसास जाता रहा

दोस्ती हमसे हमारी रात से

भोर से हर शक्स कतराता रहा

अन्जान