
दिल की दहलीज़ पे यादो के दिए रक्खे है
आज तक हमने ये दरवाजे खुले रक्खे है ।
इस कहानी के वो किरदार कहाँ से लाऊं
वही दर्या है ,वही कच्चे घड़े रक्खे है ।
हम पे जो गुजरी ,न बताया , न बतायेंगे कभी
कितने ख़त अब भी तेरे नाम लिखे रक्खे है ।
आपके पास खरीदारी की कुव्वत है अगर
आज सब लोग दुकानों में सजे रक्खे है ।
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रचनाकार -----------बशीर 'बद्र '
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो ।
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये । ।
इस मशहूर शेर को कहने वाले आप ही है ,आपको कौन नही जानता ,आप को किसी और पहचान की जरूरत नही ,एक नाम ही काफी है ।