मित्रो, इस ब्लौग में मैं मेरे पसंदीदा रचनाकारों की रचनायें प्रस्तुत करूंगी, जो निश्चित रूप से आपको भी पसन्द आयेंगी.
गुरुवार, 9 जनवरी 2014
शनिवार, 21 सितंबर 2013
बुधवार, 28 अगस्त 2013
नैन हीन को राह दिखाओ प्रभु
पग पग ठोकर खाऊँ गिर जाऊं मैं
नैनहीन को राह दिखाओ प्रभु।
तुम्हारी नगरियाँ की कठिन डगरियाँ
चलत चलत गिर जाऊं मैं
नैनहीन को राह दिखाओ प्रभु।
चहूँ ओर मेरे घोर अँधेरा
भूल न जाऊं द्वार तेरा
एक बार प्रभु हाथ पकड़ लो
मन का दीप जलाऊं मैं प्रभु ,
नैन हीनको राह दिखाओ प्रभु।
लता भजन
श्री कृष्ण जन्माष्टमी की बहुत बहुत बधाईयाँ बन्धुओ
पग पग ठोकर खाऊँ गिर जाऊं मैं
नैनहीन को राह दिखाओ प्रभु।
चलत चलत गिर जाऊं मैं
नैनहीन को राह दिखाओ प्रभु।
चहूँ ओर मेरे घोर अँधेरा
भूल न जाऊं द्वार तेरा
एक बार प्रभु हाथ पकड़ लो
मन का दीप जलाऊं मैं प्रभु ,
नैन हीनको राह दिखाओ प्रभु।
लता भजन
श्री कृष्ण जन्माष्टमी की बहुत बहुत बधाईयाँ बन्धुओ
सोमवार, 13 फ़रवरी 2012
ग़ज़ल

अमीरे -शहूर से साइल बड़ा है
बहुत नादार लेकिन दिल बड़ा है ,
लहू जमने से पहले खूँबहा दे
यहाँ इन्साफ से कातिल बड़ा है ,
चट्टानों में घिरा है और चुप है
समंदर से कही साहिल बड़ा है ,
किसी बस्ती में होगी सच की हुर्मत
हमारे शहूर में बातिल बड़ा है ,
जो ज़िल्लुल्लाह पर ईमान लाए
वही दानाओ में आकिल बड़ा है ,
उसे खोकर बहा -ए-दर्द पाई
जियाँ छोटा था और हासिल बड़ा है .
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अर्थ -------
साइल --भिखारी , नादार --गरीब , खूँबहा--खून की कीमत , हुर्मत -इज्ज़त , बातिल -झूठ , ज़िल्लुल्लाह --अल्लाह की शान ,दानाओ --बुद्धिमानो ,
आकिल --अक्लमंद ,बहा -ए -दर्द-- -दर्द की रौशनी ,ज़ियाँ--क्षति
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परवीन शाकिर
मंगलवार, 23 अगस्त 2011
भजन

सूरदास जी के इस भजन को सबने सुना ही होगा ,ये मुझे बहुत प्रिय है ,आज इसे आप सभी से साझा कर रही हूँ .
हे गोविन्द हे गोपाल राखो शरण
अब तो जीवन हारे ,
नीर पीवन हेटु गया
सिन्धु के किनारे ,
सिन्धु बीच बसत ग्राह
पाँव धरी पछारे ,
चारो पहर युद्ध भयो
ले गयो मझधारे ,
नाक -कान डूबने लागे
कृष्ण को पुकारे ,
सुर कहे श्याम सुनो
शरण है तिहारे
अब की बार मोहे पार करो
नन्द के दुलारे
हे गोविन्द हे गोपाल
हे गोपाल राखो शरण
अब तो जीवन हारे l
बुधवार, 20 जुलाई 2011
राही को समझाए कौन

किस महूरत में दिन निकलता है
शाम तक सिर्फ हाथ मलता है ,
वक़्त की दिल्लगी के बारे में
सोचता हूँ तो दिल दहलता है ,
दोस्तों ने जिसे डूबाया हो
वो जरा देर से संभलता है ,
हमने बौनो की जेब में देखी
नाम जिस चीज का सफलता है ,
तन बदलती थी आत्मा पहले
आजकल तन उसे बदलता है ,
एक धागे का साथ देने को
मोम का रोम -रोम जलता है ,
काम चाहे जेहन से चलता हो
नाम दीवानगी से चलता है ,
,
उस शहर में भी आग की है कमी
रात -दिन जो धुआं उगलता है ,
उसका कुछ तो इलाज़ करवाओ
उसके व्यवहार में सरलता है ,
सिर्फ दो -चार सुख उठाने को
आदमी बारहा फिसलता है ,
याद आते है शेर राही के
दर्द जब शायरी में ढलता है ,
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बालस्वरूप राही
राही को समझाए कौन
गुरुवार, 26 मई 2011
दो छोटी छोटी रचना

चार बार हमें भूख लगेगी
पांचवी बार
हम कुछ खा लेंगे ,
चार बार प्यास लगेगी
पांचवी बार
हम पानी पी लेंगे ,
चार बार हम जागते रहेंगे
पांचवी बार
आ जायेगी नीँद .
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आधा पहाड़ दौड़ाता है
आधा दौडाता है हमारा बोझ
आधा प्रेम दौडाता है
आधा दौडाता है सपना
दौड़ते है हम .
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रचनाकार --------मंगलेश डबराल
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