गुरुवार, 26 मई 2011

दो छोटी छोटी रचना


चार बार हमें भूख लगेगी
पांचवी बार
हम कुछ खा लेंगे ,

चार बार प्यास लगेगी
पांचवी बार
हम पानी पी लेंगे ,

चार बार हम जागते रहेंगे
पांचवी बार
आ जायेगी नीँद .
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आधा पहाड़ दौड़ाता है

आधा दौडाता है हमारा बोझ

आधा प्रेम दौडाता है

आधा दौडाता है सपना

दौड़ते है हम .
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रचनाकार --------मंगलेश डबराल

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

एक और रचना राही जी की


ज्ञान ध्यान कुछ काम न आये
हम तो जीवन -भर अकुलाये ,

पथ निहारते दृग पथराये
हर आहट पर मन भरमाये ,

झूठे जग में सच्चे सुख की
क्या तो कोई आस लगाये ।

देवालय हो या मदिरालय
जहां गये जाकर पछताए ।

तड़क -भड़क संतो की ऐसी
दुनियादार देख शरमाए ।

माल लूट का सबने बांटा
हम ही पड़े रहें अलसाए ।

जो बिक जाता धन्य वही है
जो न बिके मूरख कहलाये ।

टिकट बांटने के नाटक में
धूर्त महानायक बन छाये ।

शिष्टाचार भ्रष्टता दोनों -
ने अपने सब द्वैत मिटाए ।

जहां बिछी शतरंज वही ही
शातिर बैठे जाल बिछाए ।

अब के यू खैरात बँटी है
सारा किस्सा दिल बहलाए ।

दुर्जन पार लगाता नैया
सज्जन किसका काम बनाये ।

राही तो सीधे - सादे है
कौन भला क्या उनसे पाये ।

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

ग़ज़ल


उनके वादे कल के है
हम मेहमाँ दो पल के है ,

कहने को दो पलके है
कितने सागर छलके है ,

मदिरालय की मेजो पर
सौदे गंगा जल के है ,

नई सुबह के क्या कहने
ठेकेदार धुंधलके है ,

जो आधे में छूटी हम
मिसरे उसी गजल के है ,

बिछे पाँव में किस्मत है
टुकड़े तो मखमल के है ,

रेत भरी है आँखों में
सपने ताजमहल के है ,

क्या दिमाग का हाल कहे
सब आसार खलल के है ,

सुने आपकी राही कौन
आप भला किस दल के है ।
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किसी ने निवेदन किया था राही जी के बारे में लिखू सो कुछ शब्द उनके लिए लिख रही हूँ ।
बाल स्वरुप राही हिंदी गजल और गीत के एक ऐसे पुख्ताकलम रचनाकार है जिन्होंने गत पच्चास वर्षो में अपनी रचनाओ द्वारा जहां एक ओर हिंदी ग़ज़ल और गीत को स्तर ,प्रतिष्ठा और एतबार बख्शा है ,वही दूसरी ओर इन्होने हिंदी के छंद -काव्य को ऐसे समय में समृद्ध करने का कार्य किया है जब वह विभिन्न कव्यान्दोलानो के चलते अपनी साख खोने लगा लगा था । स्पष्ट है कि ये दोनों कार्य अपना विशेष महत्व रखते है ।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

राही को समझाए कौन


जो बात मेरे कान में ख्वाबो ने कही है
वो बात हमेशा ही गलत हो के रही है ।

जो चाहो लिखो नाम मेरे सब है मुनासिब
उनकी ही अदालत है यहाँ जिनकी बही है ।

टपका जो लहू पाँव से मेरे तो वो चीखे
कल जेल से भागा था जो मुजरिम वो वही है ।

वो चाहे मेरी जीभ मेरे हाथ पर रख दे
मैं फिर भी कहूँगा कि सही बात सही है ।

इक दोस्त से मिलने के लिए कब से खड़ा हूँ
कूचा भी वही ,घर भी वही ,दर भी वही है ।

उम्मीद की जिस छत के तले राही रुका मैं
वो छत ही क़यामत की तरह सिर पे ढही है ।
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एक और रचना बालस्वरूप राही जी की आप सभी के लिए ,उम्मीद नही यकीन है मुझे पसंद आई है ,आपको भी जरूर आएगी .

सोमवार, 28 मार्च 2011

बालस्वरूप राही की गजले


लगे जब चोट सीने में हृदय का भान होता है
सहे आघात जो हंसकर वही इंसान होता है ।

लगाकर कल्पना के पर उड़ा करते सभी नभ पर
शिला से शीश टकराकर मुझे अभिमान होता है ।

सुबह औ' शाम आ -आ कर लगाता काल जब चक्कर
धरा दो सांस में क्या है तभी यह ज्ञान होता है ।

विदा की बात सुनकर मैं बहक जाऊं असंभव है
जिसे रहना सदा वह भी कही मेहमान होता है ।

अँधेरा रात -भर जग कर गढ़ा करता नया दिनकर
सदा ही नाश के हाथो नया निर्माण होता है ।

सोमवार, 14 मार्च 2011

अंतर


दोनों शराब पी रहे थे ,
अंतर सिर्फ इतना है
कि
एक ओर उनको हवालात में
बंद कर कहा जा रहा था
"साले
न जाने देश का क्या करेंगे !"
और दूसरी ओर
पुलिस अफसर बड़े मैनर्स से
गिलास टकराता हुआ कह रहा था --
"चीयर्स "
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रचनाकार --सपना जायसवाल

शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

मुनव्वर राना की गज़ले


ये देख कर पतंगे भी हैरान हो गयी
अब तो छते भी हिन्दू -मुसलमान हो गयी ।

क्या शहर -ए-दिल में जश्न -सा रहता था रात -दिन
क्या बस्तियां थी ,कैसी बियाबान हो गयी ।

आ जा कि चंद साँसे बची है हिसाब से
आँखे तो इन्तजार में लोबान हो गयी ।

उसने बिछड़ते वक़्त कहा था कि हँस के देख
आँखे तमाम उम्र को वीरान हो गयी ।