सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

ग़ज़ल


अमीरे -शहूर से साइल बड़ा है
बहुत नादार लेकिन दिल बड़ा है ,

लहू जमने से पहले खूँबहा दे
यहाँ इन्साफ से कातिल बड़ा है ,

चट्टानों में घिरा है और चुप है
समंदर से कही साहिल बड़ा है ,

किसी बस्ती में होगी सच की हुर्मत
हमारे शहूर में बातिल बड़ा है ,

जो ज़िल्लुल्लाह पर ईमान लाए
वही दानाओ में आकिल बड़ा है ,

उसे खोकर बहा -ए-दर्द पाई
जियाँ छोटा था और हासिल बड़ा है .
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अर्थ -------
साइल --भिखारी , नादार --गरीब , खूँबहा--खून की कीमत , हुर्मत -इज्ज़त , बातिल -झूठ , ज़िल्लुल्लाह --अल्लाह की शान ,दानाओ --बुद्धिमानो ,
आकिल --अक्लमंद ,बहा -ए -दर्द-- -दर्द की रौशनी ,ज़ियाँ--क्षति
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परवीन शाकिर

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

भजन


सूरदास जी के इस भजन को सबने सुना ही होगा ,ये मुझे बहुत प्रिय है ,आज इसे आप सभी से साझा कर रही हूँ .
हे गोविन्द हे गोपाल राखो शरण

अब तो जीवन हारे ,

नीर पीवन हेटु गया

सिन्धु के किनारे ,

सिन्धु बीच बसत ग्राह

पाँव धरी पछारे ,

चारो पहर युद्ध भयो

ले गयो मझधारे ,

नाक -कान डूबने लागे

कृष्ण को पुकारे ,

सुर कहे श्याम सुनो

शरण है तिहारे

अब की बार मोहे पार करो

नन्द के दुलारे

हे गोविन्द हे गोपाल

हे गोपाल राखो शरण

अब तो जीवन हारे l

बुधवार, 20 जुलाई 2011

राही को समझाए कौन


किस महूरत में दिन निकलता है
शाम तक सिर्फ हाथ मलता है ,

वक़्त की दिल्लगी के बारे में
सोचता हूँ तो दिल दहलता है ,

दोस्तों ने जिसे डूबाया हो
वो जरा देर से संभलता है ,

हमने बौनो की जेब में देखी
नाम जिस चीज का सफलता है ,

तन बदलती थी आत्मा पहले
आजकल तन उसे बदलता है ,

एक धागे का साथ देने को
मोम का रोम -रोम जलता है ,

काम चाहे जेहन से चलता हो
नाम दीवानगी से चलता है ,
,
उस शहर में भी आग की है कमी
रात -दिन जो धुआं उगलता है ,

उसका कुछ तो इलाज़ करवाओ
उसके व्यवहार में सरलता है ,

सिर्फ दो -चार सुख उठाने को
आदमी बारहा फिसलता है ,

याद आते है शेर राही के
दर्द जब शायरी में ढलता है ,
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बालस्वरूप राही
राही को समझाए कौन

गुरुवार, 26 मई 2011

दो छोटी छोटी रचना


चार बार हमें भूख लगेगी
पांचवी बार
हम कुछ खा लेंगे ,

चार बार प्यास लगेगी
पांचवी बार
हम पानी पी लेंगे ,

चार बार हम जागते रहेंगे
पांचवी बार
आ जायेगी नीँद .
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आधा पहाड़ दौड़ाता है

आधा दौडाता है हमारा बोझ

आधा प्रेम दौडाता है

आधा दौडाता है सपना

दौड़ते है हम .
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रचनाकार --------मंगलेश डबराल

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

एक और रचना राही जी की


ज्ञान ध्यान कुछ काम न आये
हम तो जीवन -भर अकुलाये ,

पथ निहारते दृग पथराये
हर आहट पर मन भरमाये ,

झूठे जग में सच्चे सुख की
क्या तो कोई आस लगाये ।

देवालय हो या मदिरालय
जहां गये जाकर पछताए ।

तड़क -भड़क संतो की ऐसी
दुनियादार देख शरमाए ।

माल लूट का सबने बांटा
हम ही पड़े रहें अलसाए ।

जो बिक जाता धन्य वही है
जो न बिके मूरख कहलाये ।

टिकट बांटने के नाटक में
धूर्त महानायक बन छाये ।

शिष्टाचार भ्रष्टता दोनों -
ने अपने सब द्वैत मिटाए ।

जहां बिछी शतरंज वही ही
शातिर बैठे जाल बिछाए ।

अब के यू खैरात बँटी है
सारा किस्सा दिल बहलाए ।

दुर्जन पार लगाता नैया
सज्जन किसका काम बनाये ।

राही तो सीधे - सादे है
कौन भला क्या उनसे पाये ।

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

ग़ज़ल


उनके वादे कल के है
हम मेहमाँ दो पल के है ,

कहने को दो पलके है
कितने सागर छलके है ,

मदिरालय की मेजो पर
सौदे गंगा जल के है ,

नई सुबह के क्या कहने
ठेकेदार धुंधलके है ,

जो आधे में छूटी हम
मिसरे उसी गजल के है ,

बिछे पाँव में किस्मत है
टुकड़े तो मखमल के है ,

रेत भरी है आँखों में
सपने ताजमहल के है ,

क्या दिमाग का हाल कहे
सब आसार खलल के है ,

सुने आपकी राही कौन
आप भला किस दल के है ।
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किसी ने निवेदन किया था राही जी के बारे में लिखू सो कुछ शब्द उनके लिए लिख रही हूँ ।
बाल स्वरुप राही हिंदी गजल और गीत के एक ऐसे पुख्ताकलम रचनाकार है जिन्होंने गत पच्चास वर्षो में अपनी रचनाओ द्वारा जहां एक ओर हिंदी ग़ज़ल और गीत को स्तर ,प्रतिष्ठा और एतबार बख्शा है ,वही दूसरी ओर इन्होने हिंदी के छंद -काव्य को ऐसे समय में समृद्ध करने का कार्य किया है जब वह विभिन्न कव्यान्दोलानो के चलते अपनी साख खोने लगा लगा था । स्पष्ट है कि ये दोनों कार्य अपना विशेष महत्व रखते है ।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

राही को समझाए कौन


जो बात मेरे कान में ख्वाबो ने कही है
वो बात हमेशा ही गलत हो के रही है ।

जो चाहो लिखो नाम मेरे सब है मुनासिब
उनकी ही अदालत है यहाँ जिनकी बही है ।

टपका जो लहू पाँव से मेरे तो वो चीखे
कल जेल से भागा था जो मुजरिम वो वही है ।

वो चाहे मेरी जीभ मेरे हाथ पर रख दे
मैं फिर भी कहूँगा कि सही बात सही है ।

इक दोस्त से मिलने के लिए कब से खड़ा हूँ
कूचा भी वही ,घर भी वही ,दर भी वही है ।

उम्मीद की जिस छत के तले राही रुका मैं
वो छत ही क़यामत की तरह सिर पे ढही है ।
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एक और रचना बालस्वरूप राही जी की आप सभी के लिए ,उम्मीद नही यकीन है मुझे पसंद आई है ,आपको भी जरूर आएगी .